पिथौरागढ़ | सोर समाचार
पर्वतीय अंचल में आस्था और परंपरा का प्रतीक दूर्वाष्टमी, नंदाष्टमी और सातू-आठू लोकपर्व इस बार भी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाए गए। नेपाल से लेकर उत्तराखंड के गाँव-गाँव तक सुबह से ही धार्मिक वातावरण बना रहा। लोग व्रत-पूजन के साथ एक-दूसरे को पर्व की बधाइयाँ देते हुए दिखाई दिए।
इन लोकपर्वों का पर्वतीय जीवन में विशेष महत्व माना जाता है। पारंपरिक रूप से महिलाएँ परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की दीर्घायु की कामना से व्रत रखती हैं। वहीं घर-घर में पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और लोकरीति के अनुसार अनुष्ठान संपन्न किए गए।
पिथौरागढ़ नगर के श्रीरामलीला मैदान में इस अवसर पर विशेष सांस्कृतिक आयोजन किया गया। एशियन स्कूल की छात्राओं और शिक्षिकाओं ने भगवान शंकर और माता पार्वती की आकर्षक झांकी प्रस्तुत की, जिसे देखकर दर्शक भावविभोर हो उठे। झांकी में पारंपरिक परिधान, भक्ति संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं को देर तक बांधे रखा।
कार्यक्रम में हिमालयन पीठाधीश्वर श्री श्री 1008 डॉ. स्वामी वीरेन्द्रानंद गिरि महाराज और महामंडलेश्वर श्री पंचदस नाम जूना अखाड़ा विशेष रूप से उपस्थित रहे। इसके साथ ही एशियन ग्रुप ऑफ स्कूल्स उत्तराखंड के प्रबंधक भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
अपने संबोधन में संतों और अतिथियों ने कहा कि लोकपर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं और इन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने इस अवसर पर युवाओं और विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे अपनी सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं से जुड़े रहें, क्योंकि यही हमारी असली जड़ें हैं।झांकी और पूजा-अर्चना के साथ पर्व का समापन हुआ। श्रद्धालुओं ने इसे धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का संगम बताया। पर्वीय वातावरण में सामूहिकता, भक्ति और उल्लास का अद्भुत नजारा देखने को मिला।

